प्रोफेसर नाॅट ए डिक्टेटर...



जब कोई मरीज मरता है, तो लोग कहते हैं- डॉक्टर ने गलत इलाज किया होगा या फिर दवा ही गलत होगा।
वैसे ही जब कोई इमारत ढहता है, या कोई पुल टूटता है तो लोग कहते हैं इंजीनियर गलत नक्शा बनाया होगा या फिर उसमें लगने वाले मटेरियल सीमेंट-बालू ही खराब होंगे।
पर जब कोई विधार्थी फेल होता है या उसका रिजल्ट खराब होता है तो उसके अभिभावक या दूसरे लोग यह नहीं कहते हैं कि शिक्षक खराब होगा या फिर उसका किताब जिससे वह पढ़ा उसी में कोई कमी होगी।
क्योंकि आदीकाल से ही शिक्षकों के बारे में यह राय स्थापित हो चुका है कि वे गलत नहीं हो सकते!
क्यों भाई एक शिक्षक क्यों नहीं खराब/गलत हो सकता? वह वर्षों पहले के गुरुजी हुआ करते होंगे जो एकदम से परफेक्ट होते होंगे। आजकल के शिक्षक जात-पात के नाम पर, धर्म के नाम पर या फिर किसी और कारण की वजह से कुछ छात्रों के साथ होते हैं। तो कुछ के विरुद्ध।
जो अपना मूल काम पठन-पाठन को छोड़कर अन्य कामों में ज्यादा व्यस्त दिखते हैं।
हमलोगों के यहां एक कहावत है "ज्यों-ज्यों मुर्गी बढ़ती है, त्यों-त्यों दुम सुटकाती आती है"। यह कहावत एकदम से बिहार की शिक्षा व्यवस्था और यहां के शिक्षकों/प्रोफेसरों  पर सटीक बैठता है जब शिक्षक पांचवी कक्षा, आठवीं कक्षा, 12वीं कक्षा तक बच्चों को पढ़ाते हैं तो बड़ी तत्परता से पढ़ाते हुए दिखते हैं। लेकिन जैसे ही हायर क्लास के शिक्षक बनते जाते हैं तब उन्हें तत्परता कम दिखने लगती हैं। क्योंकि तब वे प्रोफेसर कहला रहे होते हैं।
जबकि एक प्रोफेसर को भारत में जितनी सुविधा, इज्जत, सहुलियत प्रदान है..उतना शायद ही किसी और पेशेवर इंसान को होगा। कोई भी व्यक्ति एक सरकारी नौकरी में रहते हुए चुनाव नहीं लड़ सकता। पर प्रोफेसर लड़ सकते हैं। किसी सरकारी पेशेवर व्यक्ति को छुट्टी लेनी हो तो, उन्हें ऐड़ी-चोटी एक करना पड़ता है। पर प्रोफेसर लोग महिनों विदेश में होने वाले गोष्ठियों या किसी फोरेन काॅलेजों में होने वाले व्याख्यान के नाम पर घुम सकते हैं।
पर मैं उन्हें प्रोफेसर नहीं कहता, क्योंकि कुछ को छोड़ कर ज्यादातर खुद को डिक्टेटर समझने लगे हैं। यदि कोई छात्र उन्हें, उनकी गलती सुझा दें तो वे धमकियां देते हैं। तुम्हें कॉलेज से निकाल दूंगा, तुम्हारा कैरियर बर्बाद कर दूंगा वगैरा-वगैरा।
इतने फायदे के साथ शिक्षक कहलाते हुए, लाखों की सैलरी लेकर के आपको ऐसे ही गुंडों वाले काम करना है तो क्या फायदा आपको प्रोफेसर बनने का! इससे अच्छा तो भाई/डाॅन बन गए होते, धमकाते रहते लोगों को।
बाकी के राज्यों का तो मुझे नहीं पता पर बिहार में अधिकांश प्रोफेसरों की यही हालात है कि वह पढ़ाने में इच्छुक नहीं होते। जब भी आप देखोगे तो वे ऑफिस में बैठकर टाइम काटते दिखते हैं। आप उनको टाइम-कटवा  भी कह सकते हैं। आप किसी भी कॉलेज के प्रोफेसरों के बारे में थोड़े अंदर से जानने की कोशिश करें तो, छात्राओं के साथ या फिर किसी दूसरे महिला प्रोफेसरों के साथ उनका ठरकी-पना भी देखने को मिलता है।
इतना ही नहीं कुछ तो ख्याति के लिए कॉलेज में कई असामाजिक तत्वों को भी सह देते दिखते हैं। जो एक कॉलेज के सभ्य वातावरण को खराब करने के लिए काफी होता है। तो आप लोग सोच ही सकते हैं किसी काॅलेज के प्रोफेसर ही ऐसा करेंगे, तो फिर उस कॉलेज का, वहां के छात्रों का, अनुशासन का, वहां की शिक्षण व्यवस्था का क्या होगा! बस भगवान भरोसे!
मैं ऐसे टाइप के कई प्रोफेसरों के सामने से गुजर रहा हूं। एक हालिया उदाहरण के रूप में आप देख सकते हैं कि पटना के ही "ए एन कॉलेज" की बीएड की विभागाध्यक्ष जो की एक महिला हैं। उनका एक ऑडियो क्लिप वायरल हुआ है जिसमें वे इतनी वाहियात गालियां दे रही है कि मैं उसे यहां लिख भी नहीं सकता। फिर भी किसी व्यक्ति को वह ऑडियो क्लिप सुनने की इच्छा हो तो, पर्सनल मैसेज करके मुझसे मांग सकते हैं। जिसमें वह एक छात्र को मां-बहन की गालियां से लेकर, शरीर के कई अंगों में बंबू/बांस डालने तक की बात कर रही हैं...और छात्र बस यही कहते हुए सुनाई पड़ रहा है कि मैम आप प्लीज गालियों का इस्तेमाल ना करें।
छात्र की गलती भी जान ही ले-
वह छात्र, मात्र मैडम को, उनके लिखे किसी कागज में से 3-4 गलतियां ढूंढ के सुझाया था कि मैडम आपने यह-यह गलतियां करी है। फिर क्या मैडम ने यहां तक कहा है कि तुम होते कौन हो मुझे मेरी गलतियां बताने वाले?
तुम कुलपति हो या शिक्षा मंत्री हो। मुझे जहां पहूंचना था मैं वहां पहूंच चूकी हूं।
तुम क्या उखाड़ सकते हो, मेरी नौकरी खा जाओगे क्या?
मैडम हम ना कुलपति है और ना ही शिक्षामंत्री, हम आपके छात्र हैं जिसे आप पढ़ाती है। आपलोग शिक्षामंत्री को या कुलपति को नहीं पढ़ाते, हमे पढ़ाते हो। इसलिए आपके गलतियों पर सवाल उठाने का हक हमारा भी है। 
बचपन में कहीं पढ़ा था कि व्यक्ति यदि ज्यादा पढ़-लिख ले तो वह व्यक्ति पके हुए फल के पेड़ के समान झुक जाता है। 
पर यहां तो उलटा ही हो रहा है। जो व्यक्ति पीएचडी तक की पढ़ाई करी है तब जाकर कहीं प्रोफेसर बने है। वे झुकते नजर नहीं आ रहे बल्कि ताड़ के पेड़ जैसे और ऊंचे होते जा रहे हैं, जिसमें ना मीठा फल है ना छाया।
फिर तो बचपन का पढ़ा हुआ गलत था या इस टाइप के प्रोफेसर, जो चोरी-चकारी या घुसखोरी कर के पद को हासिल किये हैं। ये गलत है।
पता नहीं किस बात का घमंड है। अरे तुम भी आदमी ही हो सामने वाला भी आदमी ही हैं। थोड़ा आदमियता भी दिखाओ।
अपना डिक्टेटरशिप चला के ज्यादा-ज्यादा क्या कर सकते है किसी को कॉलेज से निकाल दोगे, आपके पास बहुत पैसा है, पावर है, तो मरवाओगे-पिटवाओगे। तो क्या छात्र पढ-सीख नहीं सकता, आप ना सही कोई और पढ़ा देगा कहीं और से पढ़ लेगा।
वैसे भी आप या आपका महाविद्यालय डिग्री के अलावे कुछ नहीं देता... हमलोग डिग्री के लिए नहीं, ज्ञान के लिए पढ़ते है। और ज्ञान अर्जित करना हमे बखुबी आता है।
लेकिन कभी आप घर के किसी कोने में बैठ के अंतर्मन से पूछना कि जो कर रहे हो सही है क्या?
जिस चीज के लिए पैसे लेते हो उस पैसे के बदले में अपना कार्य नहीं कर रहे हो वो सही है?
बहुत सारे लोग अस्पताल के बेड पर सो करके सोच रहे होते हैं कि अरे पूरी जिंदगी अच्छा-अच्छा पौष्टिक खाना खाया, हमेशा अच्छी जगह पर रहा फिर भी मुझे बीमारी क्यों?
क्योंकि आपने अपने कार्यों का सही निर्वहन नहीं किया।
और ऐसे ही लोग जो अपने कार्यों का सही निर्वहन नहीं करते, उन्हीं लोगों का बेटा चोर-उचक्का बनता है, उनकी बेटी किसी और के साथ भाग जाती है। उन्हीं लोगों को जवानी में ही कैंसर, ब्लड प्रेशर, ब्रैन हैमरेज, लकवा इत्यादि जैसे रोग होते हैं।
तो भैया घमंड ना करो। अपने ईगो को साइड में रखकर, लाखो लेते हो तो उसके अनुसार ही विद्यार्थियों को शिक्षा भी दो। धमकाने भर से या मरवाने-पिटवाने से आपका बहुत कुछ ना होने वाला। क्योंकि यही आदत रही तो हमेशा कोई-ना-कोई विरोध तो करेगा ही, कितनों को साइड करोगे।
वैसे भी आजकल के छात्र पहले वाले शिष्य नहीं रहे। वह भी उल्टी खोपड़ी के हो गए हैं। ना जाने कब, कहां, क्या कर बैठे इसका आप क्या कोई भी अनुमान नहीं लगा सकता!

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