बीते साठ साल का रोना है...

तख्त की बहार है,
धर्म की आड़ है,
बीते साठ साल का रोना है,
कीचड़ को कीचड़ से धोना है,
किसान -मजदूर -बेरोजगार की फजीहत है,
रोजी-रोटी के लिए कुतर्क की नसीहत है,
मजबूत विकल्प के लिए अपंगों का रोना है,
धर्माडम्बर में अपने स्मिता-वजूद को खोना है,
अपनी हिफाजत ये अब खुद करने के लिए तत्पर हैं,
ठोस विकल्प बनने के लिए शोषितों की फौज तैयार है।

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