भावुक यादें...
कुछ भावुक यादें, जिसे एक दम से भुला पाना संभव नहीं होता!
एक मासूम सी प्यारी बच्ची, जिसका नाम-घर-जात-धर्म कुछ नहीं जाना।
इस व्यापारी दुनिया में विदआउज सेलिंग स्किल् के ही पटना के एक शाॅपिंग माॅल के बाहर गुब्बारे बेच रही थी।
तकरीबन 10-15 मिनट के परिदृश्य में मैंने देखा कि लोग उसे देखकर या पास आते ही ऐसे भाग रहे वो 5-6 साल की बच्ची सुसाईड बाॅम्बर हो।
अंत में मेरे पास भी आयी। लेकिन मैं भी उसके गुब्बारे नहीं खरीद पाया, क्योंकि गुब्बारे से खेलने का अब जी नहीं करता और ना ही वैसी कोई प्रियतम-प्रेमिका है जिसे गुब्बारे उपहार में दूं।
पर अपने हैसियत से जो बन पाया, किया।
बच्ची हंसकर फोटो खींचवाई, फिर चल दी...उसने कुछ काहा नहीं।
मैं पूरे रास्ते सोचता रहा, लोग आखिर क्यों बच्ची से दूर भाग रहे थे?
क्या उसके गंदे कपड़ों व बदबू की वजह से?
या फिर उस सोच की वजह से "गरीब ट्रेन्ड बच्चे ठग लेते हैं, चुरा लेते हैं"।
या फिर 2 घंटे सिनेमा हाॅल 2-4 घंटे फोन-लैपटॉप पर बिताने के बाद, समय ना होने की वजह से।
प्रश्न उठता है वो या उसके जैसे हजारों बच्चे उस हालात में क्यो है?
क्या वो हमेशा माॅल के बाहर वाले चबूतरा पर जिंदगी गुजारेंगे या कभी माॅल के अंदर के भी कोई चान्स है?
बस उनके किस्मत को दोष बता कर छोड़ दे।
या केवल विकास का ढोल न पिटने से उपर की कुछ करने वाली किसी सरकार की परिकल्पना करे, जो स्थिति को बदलने की मद्दा रखती हो।
काश मैं डाॅक्टर या इंजीनियर होता तो एक ऐसी माइक्रो चीप के इजात करने की कोशिश करता जो, मनुष्य को टाइम-टाइम पे उसकी मानवता के कर्तव्य से अवगत कराते रहता और उस चीप के अनुकूल काम ना करने पर करंट के झटके भी देता।
क्योंकि "विनय न मानत जलधि जड़, गए तीनि दिन बीति।
बोले राम सकोप तब, भय बिनु होइ न प्रीति"।।

Awesome!!!
ReplyDeleteThank...u sir
Deletebahut sahi kaha bhai👍👍
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद।।
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